मिर्ज़ा

कल तुम बहुत याद आये मिर्ज़ा

चाँद की रात थी, और चाँदनी झूम के बरसी

सबने जी भर पाया-खोया और उड़ाया,

ऐसी कितनी नीली रातें, हमने छत पर साथ गुज़ारी

बादल के फ़ाहों में कितना चाँद लुकाया, और छुपाया..!

और अब ये जो दाग़ नज़र आते हैं इसमें…

शायद बादल के कुछ रेशे ही चिपके हैं

हम जैसे अब कम मिलते हैं,

अब किसी खिड़की पे कोई भी नहीं टिकता है मिर्ज़ा !

ना ही दरवाज़े की आहट पे कहीं सांसें सी थमती हैं किसी की,

और वैसे भी बड़े शहरों में छत होती कहाँ है?

और हो भी गर तो अब लोगों को ये फ़ुरसत कहाँ है ?

अब कहाँ कोई दोपहर की धूप में आता बुलाने

ना मुझे आते हैं अब, वो वस्ल के दो सौ बहाने

ये ख़ता इस चाँद की समझो, ना मेरी

क्यों ये नाहक रात भर, यूँ अब्र बरसाता रहा

इस हथेली में कई सालों से वो जुंबिश नहीं है

और ना अब सागरो-मीना की ही ख़्वाहिश बची है

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इंतज़ार…

बिस्तर की सलवटों में कहीं छूट गया है
एक ख़्वाब जो आया ही नहीं, टूट गया है

जिस बुत को मैं खुदा बना के पूजता रहा
अब उसकी बंदगी से भरम टूट गया है

यूँ तो चला आया हूँ मैं जागीर छोड़ कर
एक नाम तो रिश्तों में कहीं छूट गया है

मैं इंतज़ार ही में रहा एक उम्र तक
ये सोचकर, वो आयेगा.. जो रूठ गया है

बड़ा अजब है …

बड़ा अजब ये अजाब यारों,
ना दूर है, ना है पास यारों

कोई तरसता है बूँद तक को,
कहीं लबालब है जाम यारों

कहीं बियांबान पड़ी हैं शामें
किसी की गुलज़ार हैं रातें यारों

किसी की फाँके पे ही गुज़र है
कहीं दावतें हैं आम यारों

कहीं पे सर से है छत नदारद
कहीं बिछा आसमान यारों

किसी के हिस्से में चीख़-ओ-मातम
किसी का शहनाई में नाम यारों

टटोलता है जो नब्ज़-ए-दौरां
मैं हूँ वो शायर अनाम यारों

झुलसे फूल…

ये गुलाब अब नहीं महकते हैं 

ये चिनार अब नहीं लहकते हैं 

अब तो कहवा भी जी जलाता है,

 ज़ख़्म गहरे हैं पर छलकते हैं

ये शिकारे भी बेज़ुबान हुये,

 डूबते हैं ना पार लगते हैं 

कैसा बेरंग हुआ पश्मीना, 

धागे उलझे हैं ना सुलझते हैं 

साँप रहते हैं आस्तीनों में, 

बर्फ़ पिघली कि आ धमकते हैं 

जिनकी आँखों से पोंछे थे आँसू, 

हाथ ख़ंजर नये चमकते हैं 

दर्द कम कर दे..!

तू मेरा दर्द ज़रा कम कर दे
आ मेरा क़त्ल, बे-रहम कर दे

ऐसे लूटा कि कुछ बचा ही नहीं
ग़र बचा है तो वो सितम कर दे

जाने क्यों तुमको तराशते हैं हाथ
आख़िरी बार फिर क़लम कर दे

हम तो हैं सब्र-तलब, ख़ौफ़-ए-उदू तुमको है
सब ग़ुनाह नाम मेरे लिख के उजागर कर दे

इतना बरसाओ अब्र अबकी बार
सुर्ख़ से सब्ज़ हर सुख़न कर दे

तेरी तस्वीर सूख जाएगी
आँख की कोर ज़रा नम कर दे…

ख़्वाहिश

कितनी ख़्वाहिश लिए बैठा हूँ मैं
कि और इक बार, मैं बिखर कर उठ तो सकूँ
कि मेरे पैरहन पर अटके हुए कुछ धागे
कहीं ज़मीं पे फिर से गिर ना पड़ें
कि मेरे होंठों पे ठिठके से कुछ शेर
कहीं छलक के कुछ कह तो सकें

 

कि सूखे फूलों की तरह मिल जायें कुछ लम्हे
और महक जायें उन ख़तों की तरह
तुमने लिखे थे मुझे जो सालों-साल
फिर हर चेहरे में तुमको ढूँढने की
कितनी ख़्वाहिश लिये बैठा हूँ मैं

 

कि कभी कोई चौक कर देखे मुझे भी
या किसी की आँख में मेरा भी इंतज़ार मिले
कि उसी घर में जहाँ हमने बुने थे ख़्वाब कई
तुम्हारे आग़ोश में गुज़रे थे जहाँ सालों-साल
या गली की मोड़ पर फिर से मिलो और
दौड़कर मुझसे लिपट जाओ इस क़दर कि
कोई भी दीवार अब ना दरमियाँ हो पाए कभी

 

कि कभी माहताब को छुपा के रख दूँ कहीं
रात के आख़िरी पहर के लिये,
तुम्हें महसूस करने को, पिघलकर तुम में मिलने की
कितनी ख़्वाहिश लिये बैठा हूँ मैं ….

यादें..!

यादों ने ज्यों डेरा डाल रखा है

नींद… जागती रहती है अब

वक़्त के चरखे पर कुछ ख़्वाब कत रहे हैं जबसे

रूठ गयी थी रात कभी जो, लापता सी रहती है अब

शाम मिली थी, बोझिल सी थी, उखड़ी उखड़ी

आज गले लगकर उसको बहलाया आया हूँ

सुबह को फिर एक बोसा और दो थपकी देकर तरर

सूरज वाली छतरी दे फुसलाया आया हूँ

ख़्वाहिश की डलिया भी कुछ ख़ालीख़ाली है

ठहरी सी धड़कन को कुछ टहलाया आया हूँ

चाँद जहाँ पर धुलाधुला सा, चुपबैठाथा

बारिश के कुछ रंग वहीं छलका आया हूँ

आँख के नक़्शों पर जो धूल जम गयी थी कब से

झाड़पोंछकर उनको फिर चमका आयाहूँ

ओढ़ रज़ाई, बचपन तक फिर दौड़ गया था

सूखे पौधों को फिर पानी दे आया हूँ

सूखा पेड़

गली के आख़िरी छोर पे
कितने अरसे से ताकता रहा
लोग आए गए, वक़्त के कारवाँ गुज़रे
बे-नुक़्ताचीनी, सबको छांव बाँटता रहा

चुन्नू-मुन्नू, अब्दुल-असग़र, धूम धड़ाका-धमाचौकड़ी
चोर-सिपाही, गुल्ली -डंडा
सलमा की गुड़िया ने चुनियाँ के गुड्डे के साथ
यहीं पर शादी की थी
मैंने भी तो बारात में बेर खाए थे

नत्थू दादा, छल्दू कक्का
ताश, अलाव, गुड़गुड़ हुक्का
बनवारी की मालिश, झब्बे की गप्पों के बीच
जाने कितने मसले सुलट गए थे इसके नीचे
शायद ठंडी छांव में कोई जादू सा था

ऊँचे मकान से देखा था जब आज
तेज़ धूप थी, छांव नहीं थी
चार कन्धों पे लिए जा रहे थे कुछ लोग
टूट गया था कोई बरगद शायद
काश .! मैं नीचे उतर कर मिल सकता उससे

क्यों…?

उड़ता- फिरता सा रहता है
मन क्यों भँवरे सा रहता है?

कल तक वो जो हमसाया था
क्यों बेगाना सा रहता है?

बरसों बीते बिछड़े फिर भी
मुझ में तुम सा क्यों रहता है?

जब भी हम तुम मिल जाते हैं
अफ़वाहों सा क्यों रहता है?

आँखें तो सब कह देतीं पर
धुँआ-धुँआ सा क्यों रहता है?

पैसे वालों की बस्ती में
सन्नाटा सा क्यों रहता है?

सागर पर बादल ही बादल
खेत आग सा क्यों रहता है?

बाग़ों में बसंत झरते, पर
आंगन सूना क्यों रहता है ?

मॉं…

जब भी बेहिस होता हूँ, उकता जाता हूँ
तब मैं अपनी माँ के पास चला आता हूँ

मेरी सुबह बना देने को, अपनी रात जला देती है
अपनी धोती के फ़ाहे से, आँख का तिनका बुन लेती है
काजल के एक टीके से वो, दुनियाँ भर से लड़ लेती है
टोटका- टोना, नज़र-बिलोटा, माँ सब जादू कर लेती है

लाल मिर्च और राई नमक से, सारे दर्द जला देती है
घी- गुड़ से पूज पूज कर, नीम भी मीठी कर देती है
नए घड़े का पानी पाकर तुलसी जैसे इठलाती है
पूजा वाली थाली जैसे अहो भाग्य पर इतराती है

सर से छांव नदारद कब से, धूप और चढ़ती जाती है
इतने पैर पसार लिए हैं, चादर कम पड़ती जाती है
कितने बोझ लिए फिरता हूँ, हर दिन गिरता हूँ- उठता हूँ
सपनों की साज़िश में फँसकर, हर पल ख़ुद को ही ठगता हूँ

जाना कहाँ ? कहाँ जाना है, चलना है.. चलता जाता हूँ
मुट्ठी जब भी खुल जाती है, ख़ाली हाथ यही पाता हूँ
जब भी बेहिस होता हूँ, उकता जाता हूँ
तब मैं अपनी माँ के पास चला आता हूँ …