मिर्ज़ा

कल तुम बहुत याद आये मिर्ज़ा

चाँद की रात थी, और चाँदनी झूम के बरसी

सबने जी भर पाया-खोया और उड़ाया,

ऐसी कितनी नीली रातें, हमने छत पर साथ गुज़ारी

बादल के फ़ाहों में कितना चाँद लुकाया, और छुपाया..!

और अब ये जो दाग़ नज़र आते हैं इसमें…

शायद बादल के कुछ रेशे ही चिपके हैं

हम जैसे अब कम मिलते हैं,

अब किसी खिड़की पे कोई भी नहीं टिकता है मिर्ज़ा !

ना ही दरवाज़े की आहट पे कहीं सांसें सी थमती हैं किसी की,

और वैसे भी बड़े शहरों में छत होती कहाँ है?

और हो भी गर तो अब लोगों को ये फ़ुरसत कहाँ है ?

अब कहाँ कोई दोपहर की धूप में आता बुलाने

ना मुझे आते हैं अब, वो वस्ल के दो सौ बहाने

ये ख़ता इस चाँद की समझो, ना मेरी

क्यों ये नाहक रात भर, यूँ अब्र बरसाता रहा

इस हथेली में कई सालों से वो जुंबिश नहीं है

और ना अब सागरो-मीना की ही ख़्वाहिश बची है

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