बड़ा अजब है …

बड़ा अजब ये अजाब यारों,
ना दूर है, ना है पास यारों

कोई तरसता है बूँद तक को,
कहीं लबालब है जाम यारों

कहीं बियांबान पड़ी हैं शामें
किसी की गुलज़ार हैं रातें यारों

किसी की फाँके पे ही गुज़र है
कहीं दावतें हैं आम यारों

कहीं पे सर से है छत नदारद
कहीं बिछा आसमान यारों

किसी के हिस्से में चीख़-ओ-मातम
किसी का शहनाई में नाम यारों

टटोलता है जो नब्ज़-ए-दौरां
मैं हूँ वो शायर अनाम यारों

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झुलसे फूल…

ये गुलाब अब नहीं महकते हैं 

ये चिनार अब नहीं लहकते हैं 

अब तो कहवा भी जी जलाता है,

 ज़ख़्म गहरे हैं पर छलकते हैं

ये शिकारे भी बेज़ुबान हुये,

 डूबते हैं ना पार लगते हैं 

कैसा बेरंग हुआ पश्मीना, 

धागे उलझे हैं ना सुलझते हैं 

साँप रहते हैं आस्तीनों में, 

बर्फ़ पिघली कि आ धमकते हैं 

जिनकी आँखों से पोंछे थे आँसू, 

हाथ ख़ंजर नये चमकते हैं