मौत कई बार मेरे पास आके लौट गयी..!

मैं भरी बज़्म में बैठा रहा यूँ सज़दा-ज़दाँ
बहार-ए-वस्ल कई बार आके लौट गयी

किसी मकान की टूटी हुयी छत सा हूँ मैं
बूँद आयी मगर, दरार लेके लौट गयी

रात आयी थी एक उम्मीद के साथ
सहर के साथ वो, क़रार लेके लौट गयी

मुनसलिक थी किसी मरासिम से
आज वो याद भी एक बार आके लौट गयी

मैं घर से निकला था ख़ुशी लेने
तमन्ना फिर से ऐतबार लेके लौट गयी

ना जाने और कितने दर्द अभी बाक़ी हैं,
मौत कई बार मेरे पास आके लौट गयी

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ज़िंदगी तू चीज़ क्या है ..?

कितनी क़िश्तों में गुज़ारी,
कितनी बे-ख़्वाहिश गयी
ज़िंदगी तू चीज़ क्या है ..?
अब तो समझा दे मुझे

ना कभी कोई शिक़ायत,
ना कभी कोई ग़िला
क्यों नहीं मेरी हुयी तू ?
अब तो बतला दे मुझे

धूप भरी चट्टानों जैसा,
कितना लम्बा रस्ता है ?
कौन डगर मंज़िल पहुँचेगी..?
अब तो बतला दे मुझे

तह कर-कर के रख लेता हूँ,
रात तुम्हारी यादों की
काँधे पर जो चाँद टिका है..
अब तो दिखला दे मुझे

गवाँ चुका हूँ सारे मोहरे,
रिश्तों की शतरंजों के
जीत सकूँ एक दाँव आख़िरी..
अब तो सिखला दे मुझे

दर्द कम कर दे..!

तू मेरा दर्द ज़रा कम कर दे
आ मेरा क़त्ल, बे-रहम कर दे

ऐसे लूटा कि कुछ बचा ही नहीं
ग़र बचा है तो वो सितम कर दे

जाने क्यों तुमको तराशते हैं हाथ
आख़िरी बार फिर क़लम कर दे

हम तो हैं सब्र-तलब, ख़ौफ़-ए-उदू तुमको है
सब ग़ुनाह नाम मेरे लिख के उजागर कर दे

इतना बरसाओ अब्र अबकी बार
सुर्ख़ से सब्ज़ हर सुख़न कर दे

तेरी तस्वीर सूख जाएगी
आँख की कोर ज़रा नम कर दे…

ख़्वाहिश

कितनी ख़्वाहिश लिए बैठा हूँ में
कि और इक बार, मैं बिखर कर उठ तो सकूँ
कि मेरे पैरहन पर अटके हुए कुछ धागे
कहीं ज़मीं पे फिर से गिर ना पड़ें
कि मेरे होंठों पे ठिठके से कुछ शेर
कहीं छलक के कुछ कह तो सकें
कि सूखे फूलों की तरह मिल जायें कुछ लम्हे
और महक जायें उन ख़तों की तरह
तुमने लिखे थे मुझे जो सालों-साल
फिर हर चेहरे में तुमको ढूँढने की
कितनी ख़्वाहिश लिये बैठा हूँ मैं

कि कभी कोई चौक कर देखे मुझे भी
या किसी की आँख में मेरा भी इंतज़ार मिले
कि उसी घर में जहाँ हमने बुने थे ख़्वाब कई
तुम्हारे आग़ोश में गुज़रे थे जहाँ सालों-साल
या गली की मोड़ पर फिर से मिलो और
दौड़कर मुझसे लिपट जाओ इस क़दर कि
कोई भी दीवार अब ना दरमियाँ हो पाए कभी
कि कभी माहताब को छुपा के रख दूँ कहीं
रात के आख़िरी पहर के लिये,
तुम्हें महसूस करने को, पिघलकर तुम में मिलने की
कितनी ख़्वाहिश लिये बैठा हूँ मैं ….