रहगुज़र

किसी आशियाँ की तलाश में जो चले थे मेरे साथ वो
ना क़दम रहे, ना वो कारवाँ, सब रहगुज़र भी चले गये
 
कुछ लोग जो थे हमसफ़र, उन्हें मिल गया कोई और सा
वो चले गये यूँ छोड़कर, कोई राह जैसे भुला गये
 
जिन्हें हमने अपना खुदा कहा, जिन्हें पूजा हमने हर क़दम
वही आके मेरी लाश पर से, पड़ा कफ़न भी उड़ा गये
 
इस भरे शहर में रहा हूँ फिर, मैं कैसा बदहवास सा
वो अपना चेहरा छुपाके ज्यों, मुझे मेरा हश्र बता गये
 
मेरे दिल को अब भी यक़ीं नहीं, क्यों रूह में हैं शिकन कई
कुछ चेहरे कितने हसीन थे पर सीरतों से डरा गये
 
अब किससे क्या-क्या बयां करूँ, इस ज़िंदगी की किताब के
कुछ पन्ने थे जो मुड़े हुये, फिर खुल के सामने आ गये
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परिन्दे

वो परिन्दे भी अब यहाँ नहीं आते
वो कहीं दूर बस गये शायद
 
फल लदे पेड़ सूखने से लगे
ज़मीं के कन्धे धँस गये शायद
 
शहर में बिखरा है अज़ब सा सन्नाटा
चोर, मुंसिफ़ भी बन गये शायद
 
जुबां अकड़ने लगी है, हुआ अंधेरा सा
साँप आस्तीनों के डँस गये शायद…

कितने बसंत काटोगे एेसे?

कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?
जब भी साँझ ढलेगी, तुम फिर अपने घर को आओगे
 
फिर ढूँढोगे अम्माँ ! नानी ! भूल गये थे जिनको अब तक
परियों वाली वही कहानी, क्या फिर तुमको बाँध सकेगी?
क्या फिर बैलों की घन्टी की टनटन, वो कच्ची नींदें तोड़ सकेगी ?
या बाबा की पूजा वाली मिस्री तुमको रोक सकेगी?
इस गर्मी की छुट्टी में क्या तुम नहर नहा पाओगे?
कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?
 
पाखर की टहनी पर टँगी छोड़ आये थे जिसको
झूले की एक पेंग अभी तक वहीं पड़ी है
चितकबरी बिल्ली जो तुमसे नहीं डरी थी
मरखू गैया, रस्सी तोड़े वहीं खड़ी है
क्या तुम अबकी बार, मटर-गुड़ खा पाओगे ?
कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?
 
बात हुयी थी , साथ समय के चला करोगे
ये कैसी ज़िद पाली? कितने आगे चले गये हो?
थके हुये से रहते हो, बूढ़े लगते हो
जब भी हँसते हो, खिसियाने से दिखते हो
तन का-मन का सोना खोकर, पैसों की मिट्टी पाओगे
कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?
 
मीठी सी उस नींद से पहले, याद अगर हो
चाँद, कभी तितली – तारे तुम जब माँगा करते थे
मुट्ठी भर जुगनू मैं तब लाया करता था
तुम भी कितने तारे रोज़ गिना करते थे
बहुत ज़रूरत है इन बूढ़ी आँखों को उनकी
क्या वो जुगनू तुम अब इनको दे पाओगे ?
कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?
 
गौधूलि के सूरज से कुछ आस बंधी है
तुमसे ही तो बेटा मेरी साँस बंधी है
सबके घर तो लिपे-पुते हैं, दीप जले हैं
मेरे घर का चूल्हा अब भी बुझा पड़ा है
कलरव करते पंछी भी घर लौट रहे हैं
क्या इस दीवाली तुम अपने घर आ पाओगे?
कितने बसंत काटोगे एसे? कितने सावन गाओगे?

बारिश

आज बारिश में नहाया जी भर
मैं’ को खोया, तभी ख़ुद को पाया जी भर
गुज़ारा वक़्त ख़ुद के साथ एक अरसे के बाद
यादों के परिंदों को बुलाया जी भर
 
बेवजह मुस्कुराया, चला कुछ तक पैदल, 
लगायी शर्त सूरज से, लड़ा भी जी भर
तुम्हारे रंग लेकर फिर पहन डाले हैं जब से
साँस जो रुक सी गयी थी, फिर चली जी भर
                                                       : ब्रजेश

मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ…

मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ,
लड़कपन की कहानी चाहता हूँ, 
अकेलेपन की इन पगडंडियों पर,
घनी बारिश का पानी चाहता हूँ !!
 
किताबें लेने- देने या की अखबारों की कतरन को समेटे,
तुम्हारे पास आने का बहाना चाहता हूँ,
अधूरी रह गयी थी उस बरस, जब तुम गए थे,
ग़ज़ल वो ही सुनाना चाहता हूँ !!
 
लिखे तो थे, मगर न दे सका, मैं उन खतों को,
तुम्हें इस बार देना चाहता हूँ
जो तुम लाते थे अपने साथ मैं उस चाँद को अब,
उलाहने लाख देना चाहता हूँ !!
 
तुम्हारे हाथ से सेकी हुईं उन रोटियों की,
मैं फिर दावत उड़ाना चाहता हूँ
कभी आओ, मिलो, बैठो, कहो कुछ …
बहुत मन में भरी बातें बताना चाहता हूँ !!
 
ये शोहरत, ये बुलंदी और नकलीपन के जामे,
मैं इनसे दूर जाना चाहता हूँ 
अभी तक तूने जो चाहा… किया, ये ज़िन्दगी अब,
मैं अपनी ज़िद पे आना चाहता हूँ !!
 
                                               –ब्रजेश सिंह

उड़ता- फिरता सा रहता है..!

उड़ता- फिरता सा रहता है
मन भँवरे सा क्यों रहता है?
 
कल तक वो जो हमसाया था
बेगाना सा क्यों रहता है?
 
बरसों बीते बिछड़े फिर भी
तुम सा मुझ में क्यों रहता है?
 
जब भी हम तुम मिल जाते हैं
अफ़वाहों सा क्यों रहता है?
 
आँखें तो सब कह देतीं पर
धुँआ-धुँआ सा क्यों रहता है?
 
पैसे वालों की बस्ती में
सन्नाटा सा क्यों रहता है?
 
सागर पर बादल ही बादल
खेत आग सा क्यों रहता है?

इक दिन का गुलज़ार बना दो…

इक दिन का गुलज़ार बना दो

 

मुझमें भी शायद कुछ पकता सा रहता है,
कुछ तो है जो मुझमें भी जलता रहता है,
मेरे अंदर की कुछ नदियाँ जमी पड़ी हैं,
शायद उन पर बर्फ़ पड़ी है,
सपनों को लिखने का कारोबार करा दो…
इक दिन का गुलज़ार बना दो…

 

मैं भी कोशिश करता हूँ बादल छूने की,
भींच-भींच कर धूप पकड़ने की चाहत में
झुलस गया है अंदर का कुछ,
कोई हवा नहीं छूती मेरे चेहरे को,
फ़क़त हारने के निशान हैं पेशानी पर,
इक दिन ठण्डी वाली वो बौछार करा दो
इक दिन का गुलज़ार बना दो

 

चिथड़ों में लिपटे, मुस्काते कुछ बच्चे हैं,
चौराहे पर मिल जाते हैं अक्सर,
मेरी कार की खिड़की पर यूँ टिक जाते हैं,
जैसे चौराहे का पहरेदार खड़ा हो,
ईद, दीवाली, होली, बारिश ओ बसंत,
सारे मौसम भूखे एक तरह के ?
बिन मौसम इनका कोई त्योहार करा दो…
इक दिन का गुलज़ार बना दो…

 

-ब्रजेश