अमेठी: एक खुली किताब के पन्ने

जब आप असफल होते हैं तो आपके पास अनुभव होता है और जब सफल, तो घमण्ड… इसीलिए अमेठी में हमारे अनुभव तो इतने हैं कि कोई अनुभव-काण्ड भी लिखा जा सकता है, लेकिन मैं यहाँ पर आपका ध्यान कुछ प्रायोजित और पोषित मीडिया द्वारा फैलाई गयी स्तरहीन खबरों, कुमार के चारित्रिक हनन के प्रयासों की ओर लाना चाहता हूँ. वो लोग जिन्होंने पत्रकारिता के आदर्श और मापदंडों को लात मारकर, पेज ३ पार्टियों के पास और कोटे के फ्लॅट बटोरे हों, जो खुद उगाही के साबित आरोपों में तिहाड़ रहकर आयें हों, या जिनकी वेबसाइट सिर्फ़ फिल्टरड पॉर्न से चलती हो…हमेशा खबरें बनाने की कोशिश में रहते हैं. अमेठी चुनाव में मीडिया और मेटीरियल हॅंडल करते समय मैने ऐसे कई अवसरवादियों को देखा है जो शराब की एक बोतल के लिए अपने पिता-भाई और शायद देश के खिलाफ भी अपनी बिकी क़लम चलाने से ना चूकें.

कुमार विश्वास में किसी अन्य कलाकार या राजनीतिक की तुलना में हज़ारों कमियां है, सबसे पहली है जनमानस के लिए उनकी उपलब्धता, उनका बेबाकी से बतियाना, विचारों का खुलापन… और यही सब उन्हें परेशान भी करती रहीं हैं क्योंकि अभी तक की राजनीति में कुटिलता के लिए तो स्थान है, सरलता के लिए नहीं. लेकिन जो शख्स इस राजनीति को बदलने की ज़िद में अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर आया हो, उसे कुटिलता के कनख़ज़ूरे घेर तो सकते हैं लेकिन उसको गिरा नहीं सकते. टीआरपी की हवस में अपने कपड़े उतार चुके, मीडिया के कुछ दलाल, बेसिर पैर का मसाला बेचकर भले ही कुछ देर तक अपनी लालटेन जला लें, सच के सूरज की किरण किसी की मोहताज़ नहीं होती.

राजनीति से मेरा तलवार- ढाल जैसा रिश्ता रहा है, साथ-साथ तो नहीँ, आस पास रहा हूँ, टकराता रहा हूँ पर घुला कभी नहीं. हिन्दी साहित्य और कविता की भूख रही और ऐसे ही किसी माध्यम से डा. कुमार विश्वास से मुलाकात हो गयी. ये उस दौर की बात है जब अन्ना हज़ारे महाराष्ट्र की परिधि में जाने जाते थे, अरविंद केजरीवाल किसी गली में परिवर्तन और स्वराज की परिभाषा समझा रहे होंगे और देश के अधिकतम हिन्दी प्रेमी युवा ‘कोई दीवाना कहता है’ या ‘एक पगली लड़की’ गा-सुनकर अपनी मुहब्बत कम-ज़्यादा कर रहे होंगे. सच तो ये है कि मुझे कुमार से मिलने के 2 हफ्ते बाद चला की ये वही शख्स है जिसकी कुछ कविताएँ मैं खुद पढ़ चुका था दरअसल मेरे अनुमान से कवि तो झोला-डायरी, दाढ़ी और ग़रीबी का पर्याय था. मिलना जुलना बढ़ा तो बात देश, फिर देश प्रेम और बदलाव तक जा पहुँची और एक दिन जाना कि कुमार ने अपने बचपन के साथी मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, और आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास ने जनजागरण का वो स्वरूप देखा जो कई तानाशाहों की अस्थिमज्जा में सिहरन पैदा कर दे. मैने सच में कवि कुमार विश्वास को आंदोलनकारी कुमार में बदलते देखा. अपनी कोर्पोरेट ज़िंदगी से कुछ समय चुराकर, डरते-छुपते कई बार मैं भी उस लड़ाई का साक्षी बना और हमेशा विस्मित रहा की 5 स्टार जीवनशैली जीने वाला, टीवी और स्टेज का फ़नकार आख़िर यहॉं क्या हासिल करेगा? एक बार हिम्मत जुटाकर मैने पूंछ ही लिया तो कुमार ने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा ” मैं दो जीवन जीता हूँ, पहला जो मेरे देश के प्रति कर्तव्य है और दूसरा एक स्टार कवि का… कविता और शायरी से तो लोग खुश होते हैं, पर मुझे खुशी मिलती है जब मैं देश और समाज़ के लिए कुछ अच्छा करता हूँ …”

इंडिया अगेन्स्ट करप्शन से लेकर आम आदमी पार्टी के गठन तक मैने एक कवि को कुचलते, एक आंदोलनकारी को कई पिटते और एक समग्र नेता को जन्म लेते देखा. कई बातों पर मैं उनसे सहमत नहीं रहा, क्योंकि तब तक मेरी दृष्टि में सभ्य समाज में आंदोलन के लिए ज़रूरत और जगह, दोनों ही नहीं थी. निसंदेह, अन्ना आंदोलन ने अरविंद और कुमार जैसे आंदोलनकारियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई लेकिन इस पहचान की अपनी कीमत रही, कई दोस्त, दुश्मन बन गये… जो कल तक मुशायरों और काव्य-गोष्ठियों में वाह-वाह करते थे, वो हाय-हाय करने लगे, पत्थरों ने फूलों की जगह ले ली, निज़ी ज़िंदगी तो खत्म हुई ही, लोगों ने परिवार और बच्चों को तक ना बख्शा. मैंने हालाँकि कभी कुमार को इन सबसे परेशान नहीं देखा, और हमेशा मुस्कुराकर हर सवाल को झेलते और हर बवाल को टालते देखा.

कल जब मैने एक टीवी चैनल पर उनको देखा तो शायद मुझे उनके चेहरे में वो दिखा जो बहुत लोग ना देख पायें हों, मैं उनसे बातचीत तो नहीं कर पाया पर मुझे लगा कि लोगों को वो सब भी पता लगना चाहिए जो  उससे बिल्कुल ही अलग है सच है, पर दिखाया या बताया नहीं जाता क्योंकि कोई पोषित मीडिया, अख़बार या वेबसाइट, ट्विटर- फ़ेसबुक और व्हाट्सअप पर बैठ कर मिशनरी निन्दक बन कर किसी का भी चरित्र चित्रण सिर्फ़ इसीलिए करते हैं कि २ बोटी और एक पेग की व्यवस्था हो सके.

मैं उन कुछ लोगों में से हूँ जो ये जानते हैं कि कुमार विश्वास कभी भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे, लोक सभा तो बड़ी दूर की बात… पार्टी के किसी पद पर रहने की उनकी इच्छा ना थी, अगर उनके मन में निर्भया और गुड़िया कांडों के दौरान दिखाई गयी कॉंग्रेस सरकार की, और ख़ासकर राहुल गाँधी की व्यावहारिक निष्ठुरता का विषाद ना होता तो सम्भवतः वंशवाद के खिलाफ उनका जगजाहिर रण ना ही होता. दिसंबर २३, २०१४ को मेरे जन्मदिन पर उनका फोन आया, और बातों ही बातों में उन्होने मुझे अमेठी चलने के लिए तैयार रहने को कहा, तब तक उनका चुनाव लड़ना सिर्फ़ खबरनवीसों से ही सुना था… पता चला की संजय सिंह और मनीष सिसोदिया ने राहुल गाँधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की सार्वजनिक घोषणा कुमार विश्वास से बिना पूछे ही कर दी थी. कुमार की पत्नी और मैं उन कुछ लोंगो में से थे जो इस निर्णय के विरुद्ध थे परंतु मुखर नहीं हुए क्योंकि यदि हम कुछ कहते भी तो शायद कोई सुनता भी नहीं. अन्तोगत्वा, कुछ इष्तमित्रों के साथ बैठकर हम सब अमेठी जाने की तैयारियों में जुट गये, मूलतः उत्तर प्रदेश का होने और ख़ासकर उस इलाक़े के मेरे अनुभवों के आधार पर, मेरी ज़िम्मेदारियाँ भी तय कर दी गयीं, २ और हिम्मतवाले साथियों ने वहाँ जाकर रहने का बीड़ा उठाया और हम आगे बढ़ चले.

ज़मीनी हक़ीकत:

दुनियाँ भर में गाँधी परिवार के नाम से जोड़े जाने वाले शहर की वास्तविकता ये है कि एक अच्छे होटेल या गेस्ट हाउस तो दूर, एक धर्मशाला भी इस कस्बे (शहर कहना शहर का अपमान होगा) में नहीं है, खाने के लिए हाइवे पर होने वाले ढाबों से भी निम्नतर एक दो भोजनालय ही हैं. कई दिन तक भटकने की बाद भी हमारे साथियों को एक भी ठिकाना ना मिला जिसे हम अपना मकान बना सकें, कुछ लोग तैयार हुए भी तो कॉंग्रेस के लोकल ठेकेदारों के डर से पलट भी गये. १२ जनवरी २०१४ को कुमार विश्वास की प्रस्तावित रैली होने तक हमारे पास रहने के लिए एक कमरा भी नहीं था, एक स्थानीय कार्यकर्ता के घर हमने पहली रात बिताई. रैली में जुटी भीड़ ऐतिहासिक थी, उससे ना सिर्फ़ हमारा बल्कि क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का उत्साह और भरोसा बढ़ा. अमेठी के इतिहास में पहली बार किसी ने कांग्रेस के किले पर जाकर ललकारा था.  काफ़ी मशक्कत के बाद हमें कस्बे के बाहरी तरफ एक अंडर कंस्ट्रक्शन मकान मिला जो काम भर का था. गली-गली फैले एजेंटों के डर से ना तो कोई खाना बनाने वाला तैयार हुआ ना कोई साफ़-सफ़ाई वाला, आलम ये था की खुद कुमार विश्वास सहित अन्य साथियों ने कई बार झाड़ू भी लगाइ, अपने बर्तन भी साफ़ किए, हम सबने कई-कई बार सिर्फ़ दाल-चावल खाए क्योंकि इससे अधिक पाक कला किसी को आती ही ना थी. कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने समय समय पर पूरी टीम के लिए भोजन भी बनाया, इन में से कुछ तो सिर्फ़ बदलाव के लिए लड़ाई में साथ देने अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर आईं थी. पुराने मित्रों से कह कर एक रसोइए की व्यवस्था होने तक, ऐसा कई दिन तक चलता रहा…किसी को कोई शिक़ायत ना थी, दिन भर गाँव गाँव जाकर प्रचार, जन-जागरण चलता, रात में किसी कार्यकर्ता की गज़ल, किसी के चुटकुलों पर ठहाके होते या फिर खुद प्रत्याशी को कुछ ना कुछ सुनाना पड़ता था. ना बिस्तर थे, और ना ज़रूरत भर की बिछायत, आपस में इतने घुल मिल गये थे कि विकटतम परिस्थितियों से लड़ते लड़ते, लाठी-फर्से खाते, पिट-पीटाते, पुलिस-प्रशासन का दमन सहते हुए हमने अमेठी लोकसभा के १६५७ में से १२०० से अधिक गाँवों में कुमार विश्वास को लोगों से मिलते -उनकी पीड़ा जानते समझते पाया. कुमार चुनाव तो नहीं जीत सके, लेकिन अमेठी की उस भट्टी ने उनको निज़ी और राजनीतिक रूप में बहुत अधिक सीख दी. मित्रों की भी पहचान हुई, कुछ छूटे, कुछ टूटे, हज़ारों बिखरे और लाखों जुड़े.

कुमार को जोड़कर ७ लोगों की एक कोर टीम बनाई गयी, सबको अपने कौशल और अनुभव के आधार पर काम बाँटे गये, किसी को आफ़िस, किसी को प्रेस-मीडिया, किसी को वालंटियर मॅनेज्मेंट, फंड जेनरेशन, मेटीरियल मॅनेज्मेंट…हम मैं से सभी ने अपने अपने जीवन दाँव पर लगा दिए थे, ये अति-उत्साह तो बिल्कुल ना था, शायद ज़ुनून सबसे नज़दीक का शब्द हो.

उन ५-६ महीनों में हमने कई जीवन जी लिए.. राजनीतिक द्वेष में विपक्ष ने वो सब किया जो हम बचपन में चंद्रकान्ता धारावाहिक में देखते थे, विष्कन्याओं की जगह बाहर से बुलाई गयी लड़कियों को कार्यकर्ता बना-बना कर भेजा गया, समर्थन की थाली लेकर कई ग्राम प्रधानो को भेजा गया ताकि हम उसी में उंझे रहें, पुरानी काव्य गोष्ठियों में कहे गये लतीफों की क्लिप्स बनाकर धार्मिक उन्माद भी फैलाया गया, चाकू-छुरे भी मारे गये, और इसके ऊपर पोलीस की ज़्यादतियाँ, घण्टों पोलीस स्टेशन में बिठाकर पूँछताछ ताकि हम उसी में उलझे रहें. हमारे व्यवहार से कई पुलिस अधिकारी भी मित्रवत हो गये थे, और वो अपनी मज़बूरी जाहिर करते हुए बताया करते थे कि किस तरह ना सिर्फ़ कांग्रेस बल्कि उत्तर प्रदेश प्रशासन, केन्द्रीय गृह मंत्रालय, गुप्तचर विभाग ने सिर्फ़ एक आदमी को रोकने और तोड़ने के जाल बुने थे. कुछ तथाकथित कार्यकर्ताओं के कार्य कलाप मुझे हमेशा ही संदेहास्पद लगे, मेरे अलावा कुछ और कोर मेंबर भी ऐसी ही राय रखते थे, लेकिन हम ऐसी जगह काम कर रहे थे जहाँ डर से लोग हमसे बात तो दूर, पास आने से डरते थे की कहीं लोकल ठेकेदार ना देख ले इसीलिए हमारे लिए संख्या का होना भी उतना आवश्यक था.

अगर मैं ये कहूँ कि मूलभूत संशाधनों के अलावा हमारे पास बाकी सब था, तो शायद ज़्यादा उचित होगा, हम हमेशा जूझते ही रहे, जब पैसे कम पड़ गये तो मासिक तनख़्वाह पाने वाले हम लोगों ने अपनी जमा पूंजी भी लगा दी, कुछ वेंडर्स ने जो हो सका सहयोग किया, हम हमेशा उनके आभारी ही रहेंगे क्योंकि उनको कुमार या हमारे जैसे विपलवियों से उनको भला क्या हासिल होगा?

राजनीति में स्तरहीनता का इससे बड़ा उदाहरण और भला क्या होगा कि एक साल बाद ऐसी फोटॉशोप्ड इमेजों को मसाला बना-बना कर फैलाया जा रहा है, हद तो तब होती है जब धाकड़ अँग्रेज़ी बोलकर नेशन वांट्स टू नो चिल्लाने वाले चैनल्स घंटों लंबी बहस करते हैं. डीएनए जैसे अख़बार बिना किसी सत्यता को जाने स्टोरी लिख डालते हैं, वेबदुनिया साइट फोटो फ्लश चलती हैं. इनमें से किसी ने भी ये जानने की कोशिश नहीं की होगी कि आरोप लगाने बाले की सत्यता क्या है? अमेठी में होने वाले छोटे-बड़े खर्चों की ज़िम्मेदारी मेरी थी, उनकी व्यवस्था करना और उनके भुगतान की भी, कौन हैं वो जो पैसे दे गया..? कुमार से मिलने वाला हर एक आदमी हम ६ कोर मेमेबर्स के वगैर मिल ही नहीं सकता था. ठस-ठस के भरे कमरों में भला कौन सी मुलाक़ात हो गयी ? रातें या तो जाग-जाग कर निकलती थी या फिर भाग-भाग कर…

बहरहाल, मेरा इरादा ना तो सफाई देने का है ना बर्दाश्त करने का… ऐसे प्रयास किसी भी क्षमा से ऊपर है, और निजता के उल्लघन के ऐसे प्रयासों को मुँहतोड़ ज़बाव बहुत ज़रूरी है ताकि उन्हें सबक मिल सके जो किसी की प्रतिष्ठा बेचकर अपनी रोटी, बोटी चलाते रहे हैं.

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