सुख में तो सब साथ खड़े थे…

सुख में तो सब साथ खड़े थे,
दुःख में तुमने साथ दिया है

मैं था कितना एकाकी, कितना ठहरा सा, जब तुम आये थे जीवन में
मीठी सी ज्यों धूप खिले, एक सर्द सुबह में, जैसे सावन झूम गिरे, तपते आँगन में
कितना सूखा था ये मन-घट, , जो अब तुमने थाम लिया है
सुख में तो सब साथ खड़े थे, दुःख में तुमने साथ दिया है

मैं रोता हूँ तो रोती हो, मैं सोता हूँ- तुम जगती हो
जीवन पथ की धूप-छाँव में, मेरी परछाई लगती हो
तुमने मेरे सुखों -दुखों को, अपने पल्लू बाँध लिया है
सुख में तो सब साथ खड़े थे, दुःख में तुमने साथ दिया है

कैसे आत्मसात कर डाले, तुमने रंग मेरे जीवन के
ज्यों गंगा की धार मिले, रहे जाए .. सागर की बन के
मेरे अपनों, सपनों, संघर्षो को तुमने अपना मान लिया है
सुख में तो सब साथ खड़े थे, दुःख में तुमने साथ दिया है

जीवन में कितने ऐसे मौके आये हैं,  
तुम में हो तो मीत, सखा और गुरु पाये हैं
हे सुभगे ! मैं धन्यभाग हूँ, अब सबने ही मान लिया है
सुख में तो सब साथ खड़े थे, दुःख में तुमने साथ दिया है..

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